अनुराग सर, नमस्कार|
आपके ब्लॉग पर ये कहानी पढ़ चुका हूँ, और पढने से पहले जो कुछ मैंने लिखना शुरू किया था वो सब बेमानी लगाने लगा| पहले तो यह विचार आया कि अलग अलग लोगों के एक जैसे अनुभव या विचार संयोग मात्र हैं या कुछ और? फिर जिस चीज को आप इतनी अच्छी तरह बयान कर चुके हैं उसे मैं क्या खाकर जाहिर कर पाता? और कौन मानता कि मैंने जो लिखा है वो आपका प्लाट चुरा कर नहीं लिखा? बस तभी अपना ट्रैक बदल लिया था| अपनी अनगढ़ सी कहानी उसी मोड़ पर छोड़ कर अपने असली ऊल जुलूली अवतार में आ गया था| और सिर्फ आपने यह बात गौर करी कि कहीं कोई आधी अधूरी चीज रह गयी है मेरे ब्लॉग पर| सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मैं इस विषय पर तभी तक लिख पाया जब तक आपकी कहानी नहीं पढी थी| एक बार पढने के बाद मेरे लिखने का कोई औचित्य रहा ही नहीं था| शायद आपको ध्यान होगा कि मैंने एक बार आपको मेल किया थी कि मुझे कुछ शेयर करना है आपसे, उस कुछ का बहुत कुछ तो यही स्पष्टीकरण था| अभी तक के कमेन्ट का हिस्सा तो अपनी ही राम कहानी थी|
सौभाग्य औरों के लिए कहानी हो सकती है, मेरे लिए आपबीती सी है, और आपबीती अच्छी बुरी नहीं होती| प्रस्तुतीकरण प्रभावी है| लोग थोड़े में बहुत कह जाते हैं, मेरे बहुत को थोडा समझ सकें तो धन्य मानूंगा खुद को| आज सुबह सुनी है ये प्रस्तुति, अच्छा है कि आज अकेला हूँ घर में और रविवार है आज|
आपका बहुत आभारी
संजय
लावण्या
26 October 2009 10:28 am
बेहद सार्थक और सटीक प्रयास के लिए दोनों को बधाई
- लावण्या